Bhagavad Gita : अध्याय 7 श्लोक 7 - 30

 
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जो मुझ परमेश्र्वर को मेरी पूर्ण चेतना में रहकर मुझे जगत् का, देवताओं का तथा समस्त यज्ञविधियों का नियामक जानते हैं, वे अपनी मृत्यु के समय भी मुझ भगवान् को जान और समझ सकते हैं |

Those who know Me as the Supreme Lord, as the governing principle of the material manifestation, who know Me as the one underlying all the demigods and as the one sustaining all sacrifices, can, with steadfast mind, understand and know Me even at the time of death.

तात्पर्य

कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाले मनुष्य कभी भी भगवान् को पूर्णतया समझने के पथ से विचलित नहीं होते | कृष्णभावनामृत के दिव्य सान्निध्य से मनुष्य यह समझ सकता है कि भगवान् किस तरह भौतिक जगत् तथा देवताओं तक के नियामक हैं | धीरे-धीरे ऐसी दिव्य संगति से मनुष्य का भगवान् में विश्र्वास बढ़ता है, अतः मृत्यु के समय ऐसा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण को कभी भुला नहीं पाता | अतएव वह सहज ही भगवद्धाम गोलोक वृन्दावन को प्राप्त होता है |

यह सातवाँ अध्याय विशेष रूप से बताता है कि कोई किस प्रकार से पूर्णतया कृष्णभावनाभावित हो सकता है | कृष्णभावना का शुभारम्भ ऐसे व्यक्तियों के सान्निध्य से होता है जो कृष्णभावनाभावित होते हैं | ऐसा सान्निध्य आध्यात्मिक होता है और इससे मनुष्य प्रत्यक्ष भगवान् के संसर्ग में आता है और भगवत्कृपा से वह कृष्ण को भगवान् समझ सकता है | साथ ही वह जीव के वास्तविक स्वरूप को समझ सकता है और यह समझ सकता है कि किस प्रकार कृष्ण को भुलाने से वह प्रकृति के नियमों द्वारा बद्ध हुआ है | वह यह भी समझ सकता है कि यह मनुष्य-जीवन कृष्णभावनामृत को पुनः प्राप्त करने के लिए मिला है, अतः इसका सदुपयोग परमेश्र्वर की अहैतुकी कृपा प्राप्त करने के लिए करना चाहिए |

इस अध्याय में जिन अनेक विषयों की विवेचना की गई है वे हैं – दुख में पड़ा हुआ मनुष्य, जिज्ञासु मानव, अभावग्रस्त मानव, ब्रह्म ज्ञान, परमात्मा ज्ञान, जन्म, मृत्यु तथा रोग से मुक्ति एवं परमेश्र्वर की पूजा | किन्तु जो व्यक्ति वास्तव में कृष्णभावनामृत को प्राप्त है, वह विभिन्न विधियों की परवाह नहीं करता | वह सीधे कृष्णभावनामृत में प्रवृत्त होता है और उसी से भगवान् कृष्ण के नित्य दास के रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त करता है | ऐसी अवस्था में वह शुद्धभक्ति में परमेश्र्वर के श्रवण तथा गुणगान में आनन्द पता है | उसे पूर्णविश्र्वास रहता है कि ऐसा करने से उसके सारे उद्देश्यों की पूर्ति होगी | ऐसी दृढ़ श्रद्धा दृढव्रत कहलाती है और यह भक्तियोग या दिव्य प्रेमाभक्ति की शुरुआत होती है | समस्त शास्त्रों का भी यही मत है | भगवद्गीता का यह सातवाँ अध्याय इसी निश्चय का सारांश है |

PURPORT
Persons acting in Kṛṣṇa consciousness are never entirely deviated from the path of understanding the Supreme Personality of Godhead. In the transcendental association of Kṛṣṇa consciousness, one can understand how the Supreme Lord is the governing principle of the material manifestation and even of the demigods. Gradually, by such transcendental association, one becomes convinced of the Supreme Personality of Godhead Himself, and at the time of death such a Kṛṣṇa conscious person can never forget Kṛṣṇa. Naturally he is thus promoted to the planet of the Supreme Lord, Goloka Vṛndāvana.
This Seventh Chapter particularly explains how one can become a fully Kṛṣṇa conscious person. The beginning of Kṛṣṇa consciousness is association of persons who are Kṛṣṇa conscious. Such association is spiritual and puts one directly in touch with the Supreme Lord, and, by His grace, one can understand Kṛṣṇa to be the Supreme God. At the same time one can really understand the constitutional position of the living entity and how the living entity forgets Kṛṣṇa and becomes entangled in material activities. By gradual development of Kṛṣṇa consciousness in good association, the living entity can understand that due to forgetfulness of Kṛṣṇa he has become conditioned by the laws of material nature. He can also understand that this human form of life is an opportunity to regain Kṛṣṇa consciousness and that it should be fully utilized to attain the causeless mercy of the Supreme Lord.
Many subjects have been discussed in this chapter: the man in distress, the inquisitive man, the man in want of material necessities, knowledge of Brahman, knowledge of Paramātmā, liberation from birth, death and diseases, and worship of the Supreme Lord. However, he who is actually elevated in Kṛṣṇa consciousness does not care for the different processes. He simply directly engages himself in activities of Kṛṣṇa consciousness and thereby factually attains his constitutional position as eternal servitor of Lord Kṛṣṇa. In such a situation he takes pleasure in hearing and glorifying the Supreme Lord in pure devotional service. He is convinced that by doing so, all his objectives will be fulfilled. This determined faith is called dṛḍha-vrata, and it is the beginning of bhakti-yoga or transcendental loving service. That is the verdict of all scriptures. This Seventh Chapter of the Gītā is the substance of that conviction.

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु : |
प्रयाणकालेSपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः || ३० ||

स-अधिभूत – तथा भातिक जगत् चलाने वाले सिद्धान्त; अधिदैवम् – समस्त देवताओं को नियन्त्रित करने वाले; माम् – मुझको; स-अधियज्ञम् – तथा समस्त यज्ञों को नियन्त्रित करने वाले; च – भी; ये – जो; विदुः – जानते हैं; प्रयाण – मृत्यु के; काले – समय में; अपि – भी; च – तथा; माम् – मुझको; ते – वे; विदुः – जानते हैं; युक्त-चेतसः – जिनके मन मुझमें लगे हैं |

भावार्थ

जो मुझ परमेश्र्वर को मेरी पूर्ण चेतना में रहकर मुझे जगत् का, देवताओं का तथा समस्त यज्ञविधियों का नियामक जानते हैं, वे अपनी मृत्यु के समय भी मुझ भगवान् को जान और समझ सकते हैं |

 

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