Shrimad Bhagvatam‬

इस संसार का हर व्यक्ति सुख प्राप्त करने के लिए सकाम कर्मों में प्रवृत्त होता है, किंतु ना तो उसे तृप्ति मिलती है ना ही उसके दुख में कोई कमी आती है |विपरीत इसके ऐसे कार्यों से उसके दुख में वृद्धि होती है| भगवान के विषय में पर्याप्त श्रवण किय बिना मानव समाज में ऐसा कौन होगा जो तुष्ट होता हो ? मनुष्य के कानों में ऐसी काथाएँ प्रविष्ठ होकर उसके परिवारिक मोह के बंधन को काट देती है | [SB: 3.5.2]
Everyone in this world engages in fruitive activities to attain happiness, but one find...

भगवान के यशस्वी कर्मों तथा मर्त्यलोक में असाधारण लीलाओं को संपन्न करने के लिए उनके द्वारा धारण किय जाने वाले विविध दिव्य रूपों को समझ पाना उनके भक्तों के अतिरिक्त अन्य किसी के लिए अत्यंत कठिन है और पशुप्रवृत्ति वाले मनुष्यों के लिए तो वे मानसिक विक्षोभ मात्र हैं |
[SB: 11.4.34]...

यदि कोई अज्ञानी जिसने भौतिक इंद्रियों को वश में नहीं किया है, वह वैदिक आदेशों में अटल नहीं रहता, तो वह निश्च्य ही पापमय तथा अधार्मिक कार्यों में लिप्त रहेगा | इस तरहा उसको बारंबार जन्म-मृत्यु भोगना पड़ेगा |(SB:11.3.45)
तात्पर्य
भगवतगीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन द्वारा प्रतिनिधित्व करने वाले बद्धजीवों को जीवन के वास्तविक लक्ष्य के विषय में अद्भुत बातें बताई हैं | जो व्यक्ति इन उपदेशों में अपने मन को स्थिर नहीं कर पाता, उसे ऐसा भौतिकतावादी व्यक्ति मानना चाहिए, जो पापकर्मों मे...

अद्धयात्मिक तथा भौतिक सृष्टियों के सर्वदयालु नियंता भगवान अजन्मा हैं, किंतु जब उनके शांत भक्तों तथा भौतिक गुणों वाले व्यक्तियों के बीच संघर्ष होता है, तो वे महत तत्व के साथ उसी तरहा जन्म लेते हैं जिस तरहा अग्नि उत्पन्न होती है |....