Gita

भगवद् भक्ति में शुद्धता का होना अति आवश्यक है, शुद्धता दो प्रकार की होती है बाहरी और आंतरिक शुद्धता | बाहरी शुद्धता का अभिप्राय शरीर की शुद्धता है तथा आंतरिक शुद्धता के लिए मनुष्य को कृष्ण का चिंतन निरंतर करना चाहिए जो की हमारे पूर्व जन्मों के पापों को नष्ट करता है और हमारी इंद्रियों को शुद्ध करता है | इस प्रकार हमारी आसक्ति विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में नहीं रहती |....

भगवद् भक्ति में शुद्धता का होना अति आवश्यक है, शुद्धता दो प्रकार की होती है बाहरी और आंतरिक शुद्धता | बाहरी शुद्धता का अभिप्राय शरीर की शुद्धता है तथा आंतरिक शुद्धता के लिए मनुष्य को कृष्ण का चिंतन निरंतर करना चाहिए जो की हमारे पूर्व जन्मों के पापों को नष्ट करता है और हमारी इंद्रियों को शुद्ध करता है | इस प्रकार हमारी आसक्ति विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में नहीं रहती |....

अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! पहले आप मुझसे कर्म त्यागने के लिए कहते हैं और फिर भक्तिपूर्वक कर्म करने का आदेश देते हैं | क्या आप अब कृपा करके निश्चित रूप से मुझे बताएँगे कि इन दोनों में से कौन अधिक लाभप्रद है?
Arjuna said: O Kṛṣṇa, first of all You ask me to renounce work, and then again You recommend work with devotion. Now will You kindly tell me definitely which of the two is more beneficial?....

जो व्यक्ति अपने कर्मफलों का परित्याग करते हुए भक्ति करता है और जिसके संशय दिव्यज्ञान द्वारा विनष्ट हो चुके होते हैं वही वास्तव में आत्मपरायण है | हे धनञ्जय! वह कर्मों के बन्धन से नहीं बँधता |
Therefore, one who has renounced the fruits of his action, whose doubts are destroyed by transcendental knowledge, and who is situated firmly in the self, is not bound by works, O conqueror of riches....