BhagvadGita

जिन मनुष्यों ने पूर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यकर्म किये हैं और जिनके पापकर्मों का पूर्णतया उच्छेदन हो चुका होता है, वे मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाते हैं और वे संकल्पपूर्वक मेरी सेवा में तत्पर होते हैं |
O scion of Bharata [Arjuna], O conquerer of the foe, all living entities are born into delusion, overcome by the dualities of desire and hate....

निस्सन्देह ये सब उदारचेता व्यक्ति हैं, किन्तु जो मेरे ज्ञान को प्राप्त है, उसे मैं अपने ही समान मानता हूँ | वह मेरी दिव्यसेवा में तत्पर रहकर मुझ सर्वोच्च उद्देश्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है |
All these devotees are undoubtedly magnanimous souls, but he who is situated in knowledge of Me I consider verily to dwell in Me. Being engaged in My transcendental service, he attains Me....

तुम जान लो कि मेरी शक्ति द्वारा सारे गुण प्रकट होते हैं, चाहे वे सतोगुण हों, रजोगुण हों या तमोगुण हों | एक प्रकार से मैं सब कुछ हूँ, किन्तु हूँ स्वतन्त्र | मैं प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हूँ, अपितु वे मेरे अधीन हैं |
All states of being-be they of goodness, passion or ignorance-are manifested by My energy. I am, in one sense, everything-but I am independant. I am not under the modes of this material nature...

मैं बलवानों का कामनाओं तथा इच्छा से रहित बल हूँ | हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन)! मैं वह काम हूँ, जो धर्म के विरुद्ध नहीं है |
I am the strength of the strong, devoid of passion and desire. I am sex life which is not contrary to religious principles, O Lord of the Bhāratas [Arjuna]....