‎GitaPS‬

भगवद् भक्ति में शुद्धता का होना अति आवश्यक है, शुद्धता दो प्रकार की होती है बाहरी और आंतरिक शुद्धता | बाहरी शुद्धता का अभिप्राय शरीर की शुद्धता है तथा आंतरिक शुद्धता के लिए मनुष्य को कृष्ण का चिंतन निरंतर करना चाहिए जो की हमारे पूर्व जन्मों के पापों को नष्ट करता है और हमारी इंद्रियों को शुद्ध करता है | इस प्रकार हमारी आसक्ति विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में नहीं रहती |....

जो पुरुष न तो कर्मफलों से घृणा करता है और न कर्मफल की इच्छा करता है, वह नित्य संन्यासी जाना जाता है | हे महाबाहु अर्जुन! ऐसा मनुष्य समस्त द्वन्द्वों से रहित होकर भवबन्धन को पार कर पूर्णतया मुक्त हो जाता है |
अज्ञानी ही भक्ति (कर्मयोग) को भौतिक जगत् के विश्लेषात्मक अध्ययन (सांख्य) से भिन्न कहते हैं | जो वस्तुतः ज्ञानी हैं वे कहते हैं कि जो इनमें से किसी एक मार्ग का भलीभाँति अनुसरण करता है, वह दोनों के फल प्राप्त कर लेता है |....

जो श्रद्धालु दिव्यज्ञान में समर्पित है और जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह इस ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है और इसे प्राप्त करते ही वह तुरन्त आध्यात्मिक शान्ति को प्राप्त होता है |
A faithful man who is absorbed in transcendental knowledge and who subdues his senses quickly attains the supreme spiritual peace....

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान्‌ शत्रु हैं॥
Attraction and repulsion for sense objects are felt by embodied beings, but one should not fall under the control of senses and sense objects because they are stumbling blocks on the path of self-realization....