Article March 14, 2017

एक व्यक्ति पाकिस्तान से एक लाख रुपैये का रूहानी इत्र लेकर आये थे। क्योंकि उन्होंने संत श्री हरिदास जी महाराज और बांके बिहारी के बारे में सुना हुआ था। उनके मन में आये की मैं बिहारी जी को ये इत्र भेंट करूँ। इस इत्र की खासियत ये होती है की अगर बोतल को उल्टा कर देंगे तो भी इत्र धीरे धीरे गिरेगा और इसकी खुशबु लाजवाब होती है।
ये व्यक्ति वृन्दावन पहुंचा। उस समय संत जी एक भाव में डूबे हुए थे। संत देखते है की राधा-कृष्ण दोनों होली खेल रहे हैं। जब उस व्यक्ति ने देखा की ये तो ध्यान में हैं तो उसने वह इत्र की शीशी उनके पास में रख दी और पास में बैठकर संत की समाधी खुलने का इंतजार करने लगा।
तभी संत देखते हैं की राधा जी और कृष्ण जी एक दूसरे पर रंग डाल रहे हैं। पहले कृष्ण जी ने रंग से भरी पिचकारी राधा जी के ऊपर मारी। और राधा रानी सर से लेकर पैर तक रंग में रंग गई। अब जब राधा जी रंग डालने लगी तो उनकी कमोरी(छोटा घड़ा) खाली थी।
संत को लगा की राधा जी तो रंग डाल ही नहीं पा रही है क्योंकि उनका रंग खत्म हो गया है। तभी संत ने तुरंत वह इत्र की शीशी खोली और राधा जी की कमोरी में डाल दी और तुरंत राधा जी ने कृष्ण जी पर रंग डाल दिया। हरिदास जी ने सांसारिक दृष्टि में वो इत्र भले ही रेत में  डाला। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि में वो राधा रानी की कमोरी में डाला।

Krishna Prem (Ronald Henry Nixon) story in hindi : “कृष्ण प्रेम” रोनाल्ड हेनरी निक्सन कहानी(कथा)
 
रोनाल्ड निक्सन का पूरा नाम रोनाल्ड हेनरी निक्सन था। ये अंग्रेज थे लेकिन आज लोग इन्हें “कृष्ण प्रेम” के नाम से जानते हैं।
ये इंग्लैंड से थे। 18 वर्ष की उम्र में प्रथम जर्मन युद्ध में श्री रोनाल्ड निक्सन ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। वे उस युद्ध में हवाई बेड़े में एक ऊँचे अफसर थे। युद्ध का उन्माद उतर जाने पर उनके हृदय में भयंकर विभीषिका अपनी आँखों देखी थी।
हत्या, मारकाट, मृत्यु का ताँडव रक्तपात, हाहाकार और चीत्कार ने उनकी शाँति हरण कर ली। उन्होंने लिखा कि मानव विकास के उस वीभत्स दृश्य ने उनके हृदय में भयंकर उथल-पुथल मचा दी। बहुत प्रयत्न करने पर भी उनकी मनःस्थिति शाँत नहीं हो रही थी। मानसिक व्यग्रता ने उन्हें विक्षिप्त सा बना दिया था। इनके मन को कहीं भी शांति नही मिली।
फिर वे एक दिन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जा पहुँचे। जहाँ इनका परिचय वेदांत, ईश्वरज्ञान और महात्मा बुद्ध के बारे में हुआ। और ईश्वर प्राप्ति की खोज में भारत आ गए।
 
श्री कृष्ण प्रेरणा से ब्रज में आकर बस गये। उनका कन्हैया(कृष्ण) से इतना प्रगाढ़ प्रेम था कि वे कन्हैया को अपना छोटा भाई(younger brother ) मानने लगे थे।

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥

भावार्थ : जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है ॥38॥