Article March 9, 2017

जय श्री राधे कृष्णा

"बरसाना में श्री रुप गोस्वामी चेतन्य महाप्रभु के छः शिष्यो में
से एक । एक बार भृमण करते करते अपने चेले जीवगोस्वामी जी के
यहाँ बरसाना आए जीवगोस्वामी जी ठहरे फक्कड़ साधु फक्कड़
साधू को जो मिल जाय वो ही खाले जो मिल जाय वो ही
पिले आज उनके गुरु आए तो उनके मन भाव आया की में रोज सुखी
रोटी पानी में गला गला कर खा लेता हु मेरे गुरु आय क्या
खिलाऊँ एक बार अपनी कुटिया में देखा किंचित तिन दिन
पुरानी रोटी बिल्कुल कठोर हो चुकी थी में साधू पानी में
गला गला खालू यद्यपि मेरा गुरु साधुता की परम स्थति को
प्राप्त कर चुके है फिर भी मेरे मन के आनन्द के लिए कैसे मेरा मन
संतुष्ट होगा एक क्षण के भक्त के मन में सँकल्प आया की अगर
समय होता तो किसी बृजवासी के घर चला जाता दूध मांग
लेता चावल मांग लाता मेरे गुरु पधारे जो देह के समन्ध मेरे चाचा
लगते है लेकिन भाव साम्रज्य में प्रवेश कराने वाले मेरे गुरु तो है
उनको खीर खिला देता रूपगोस्वामी ने आकर कहा जिव भूख लगी है तो जिव
गोस्वामी उन सुखी रोटीयो को अपने गुरु को दे रहा है अँधेरा
हो रहा है जिव गोस्वामी की आँखों में अश्रु आ रहे है और
रुपगोस्वामी जी ने कहा तू क्यों रो रहा है हम तो साधू है ना
जो मिल जाय वही खा लेते है नहीं में खा लूंगा जीव ने कहा नहीं बाबा मेरा मन नहीं मान रहा
आप की यदि कोई पूर्व सुचना होती तो मेरे मन में कुछ था यह
चर्चा हो रही थी की कोई दरवाजा खटखटा रहा था
अर्द्धरात्रि में कोई दरवाजा खटखटा रहा था ज्यो ही
दरवाजा खटखटाया है जीव गोस्वामी जी ने दरवाजा खोला
है एक किशोरी खड़ी हुई है 8 -10 वर्ष की एक बालिका थी
हाथ में कटोरा है कहा बाबा मेरी माँ ने खीर बनाई है और कहा
जाओ बाबा को दे आओ जीव गोस्वामी ने उस खीर के कटोरे
को ले जाकर रुपगोस्वमि जी के पास रख दिया बोले बाबा
पाओ ज्यो ही रूपगोस्वमि ने उस खीर को स्पर्श किया उनका हाथ
कांपने लगा जीव गोस्वामी को लगा बाबा का हाथ कांप
रहा है पूछा बाबा कोई अपराध बन गया है
रूपगोस्वामी जी ने पूछा जीव आधी रात को यह खीर कोन
लाया ,बाबा पड़ोस एक कन्या है मै जानता हु उसे वो लेके आई है
नहीं जीव इस खीर मेने चख के देखा और में ऎसे रोमांच हो गया
नहीं जीव् तू पता कर यह जोव मुझे मेरे किशोरी जी के होने
अहसास दिला रही है नहीं बाबा वह कन्या पास की है मैं
जानता हु उसको अर्ध रात्रि में दोनों गए है और दरवाजा खटखटाया अंदर से एक
उस कन्या की माँ निकल कर बाहर आई जीव गोस्वामी जी ने
पूछा आपकी कष्ट दिया परन्तु आपकी लड़की कहां है उस
महिला ने कहा का बात है गई बाबा कहा, आपकी लड़की है
कहाँ वो तो उसके ननिहाल गई है गोवेर्धन 15 दिन हो गए
,रूपगोस्वामी जी तो मूर्छित हो गए जीव गोस्वामी जी ने पैर
पकडे और जैसे तेसे श्रीजी के मंदिर की सीढ़िया जैसे एक क्षण में
चढ़ जाय लंबे लंबे टग भरते हुए मंदिर पहुचे वहां श्री गोसाई जी से
कहा बाबा एक बात बताओ आज क्या भोग लगाया था
श्रीजी को श्यामाँ प्यारी को गोसाई जी जानते थे श्री
जीव गोस्वामी को कहा क्या बात हे गई बाबा
कहा क्या भोग लगाया था गोसाई जी ने कहा आज श्रीजी
को खीर का भोग लगाया था रूपगोस्वामी तो श्री राधे श्री
राधे कहने लगे उन्होंने गोसाई जी से कहा बाबा एक निवेदन और
है आप से यद्दपि यह मंदिर की परंपरा के विरुद्ध है एक बार जब
श्री जी को शयन करा दिया जाय तो उनकी लीला में जाना
अपराध है प्रिया प्रियतम जब विराज रहे हो तो नित्य लीला है
उनकी अपराध है फिर आप एक बार यह बता दीजिये की जिस
पात्र में भोग लगाया था वह पात्र रखो है के नहीं रखो है
गोसाई जी मंदिर के पट खोलते है देखते है की वह पात्र नहीं है
वहा पर गोसाई जी बाहर आते है और कहते बाबा वह पात्र नहीं है
वहां पर न जाने का बात है गई रूपगोस्वामी जी अपना दुप्पटा
हटाया और वह चाँदी का पात्र दिखाया बाबा यह पात्र तो
नहीं है गोसाई जी ने कहा हा बाबा यही पात्र है
रूपगोस्वामी जी ने कहा श्री राधारानी 300 सीढ़ी उतरकर
मुझे खीर खिलाने आई किशोरी पधारी थी राधारानी आई
थी उस खीर को मुख पर रगड़ लिया सब साधु संतो को बांटते हुए
श्री राधे श्री राधे करते हुई फिर कई वर्षो तक श्री रूपगोस्वामी
जी बरसाना रहे !! "
|| भक्त के मन में कोई भाव आए तो उसे ठाकुरजी पुरा करेंगे ||

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥

भावार्थ : हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है ॥35॥