Article March 4, 2017

यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥

भावार्थ : परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है ॥34॥