Article February 7, 2017

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्‌ ।वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्‌ ॥

भावार्थ : किन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान ॥21॥

भक्त रघु केवट
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महातीर्थ श्री जगन्नाथ पुरी के समीप एक ग्राम पिपलीचटी था । इसी ग्राम में रघु केवट नाम का मछुवारा रहता था , पत्नी तथा वृद्धा माता थीं । परिवार छोटा अवश्य था परंतु गरीबी से परिपूर्ण था दारिद्र जीवन-यापन हो रहा था ।
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रघु केवट पूर्वजन्म के संस्कारों से सहृदय था वह जीवन यापन के लिए मछली पकड़ कर बेचने का जातीय कार्य करता परंतु मछलियों को तड़पते देख कर वह बहुत दुखी होता था ।
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वह प्रत्येक मछ्ली को जल से निकालने के बाद व्यथित होकर उससे क्षमा याचना करता था| जीवन निर्वाह का अन्य साधन न होने के कारण उसे वह अपराध निरंतर करना पड़ता था ।
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एक दिन उसे नदी के रास्ते में एक तेजस्वी साधु मिले | साधु भी उसकी भक्ति में रुचि देखकर बड़े प्रसन्न हुए और उसे गुरु दीक्षा दी ।
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उसे एक तुलसी कि माला दी और भगवान के भजन में रत रहने का आदेश दिया । अब रघु केवट प्रात: स्नान करके दोपहर तक भजन में लीन रहता ।
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अब उसने मछ्ली पकड़ने का कार्य जैसे-तैसे चलाया, फिर उपवास की स्थिति आ गई, तब पत्नी ने उससे कहा-
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यदि तुलसी माला गले में डालकर भजन ही करना है तो अपनी माता और मुझे नदी को समर्पित कर दो ।
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पत्नी तिरस्कृत स्वर में बोली : गृहस्थी का आर्थिक बोझ पुरुष के ऊपर होता है और तुम स्त्रियों से भी नीचे बनते जा रहे हो ।
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परंतु…? उसने कुछ कहना चाहा ।
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कोई भी भजन, कोई भी भगवान यह नहीं कहता कि अपने आश्रितों को भाड़ में झोंक कर मेरी स्तुति करो ।
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अच्छा मेरा जाल मुझे दो । मैं जाता हूं । अंतत : रघु को पुन : अपना जाल पकड़ना पड़ा ।
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वह जाल लेकर नदी पर पहुचा और भगवान से अपने इस अपराध की क्षमा याचना के साथ जाल नदी में फेंक दिया।
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कई बार उसके हृदय में यह बात आई कि जाल वापस खींच ले परतु पत्नी का तिरस्कार स्मरण होते ही सहम जाता । उसके चित्त में भगवान बस गए ।
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कुछ देर बाद उसने जाल खींचा तो उसमें ढेरों मछलियां थीं परतु एक बड़ी लाल मछली को देखकर उसे आश्चर्य हुआ । वैसी मछली उसने आज तक नहीं देखी थी ।
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उसने सबसे पहले उसे ही जाल से निकाला । हे अद्भुत मछली ! अवश्य ही तुम मछलियों की रानी हो । तुम्हारा विचित्र रूप मुझे आनंदित कर रहा है । मेरा हृदय तुम्हें बेचने को नहीं कर रहा क्योंकि प्रत्येक जीव में ब्रह्म का वास होता है परतु मैं विवश हूं ।
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मेरे पास जीविका का अन्य कोई साधन नहीं है । वह दुखी स्वर में बोला । उसने मछली के गलफड़ों में उंगली डाली ।
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हे नारायण ! मेरी रक्षा करो । सहसा मछली की करुण पुकार-गूंजी ।
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रघु केवट चकित रह गया । उसे जाने क्या हुआ वह मछली को लेकर उस पहाड़ी झरने की तरफ दौड़ा जहां एक शीतल जलकुंड था। उसने मछली को उस जलकुंड में छोड़ दिया ।
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अब वह अपनी पत्नी और माता को भी भूल गया। उसके हृदय में तो एक प्रकाश पुंज भर गया था ।
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हे प्रभो ! आपने मुझे मछली के भीतर से ‘नारायण’ की ध्वनि सुनाई है । अब मैं आपके दर्शन पाए बिना यहां से न हिलूंगा । वह वहीं बैठ गया ।
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हाथ में तुलसी की माला लेकर उसने ‘नारायण नारायण’ की रट लगा दी । न उसे भूख थी न प्यास । तीन दिन तक वह बिना अन्न-जल ग्रहण किए वहीं बैठा रहा ।
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कब तक भगवान अपने भक्त का कष्ट देख सकते हैं ? उन्हें आना पड़ा। ब्राह्मण वेश में आकर वह रघु केवट के पास खड़े हो गए ।
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अरे तपस्वी ! तू इस घोर अंधेरी रात्रि में क्या कर रहा है ? ब्राह्मण वेशधारी भगवान ने पूछा । रघु केवट ने ब्राह्मण जानकर प्रणाम किया ।
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महात्मन ! मैं भगवान का नाम ले रहा हूं। अब कृपा करके आप मेरे भजन में बाधा न डालें । मेरी निरंतरता भग होती है ।
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मैं तो जा रहा हूं, परंतु तू यह सोच कि मछ्ली भी कभी मनुष्य की आवाज में बोल सकती है ? ब्राह्मण हंस कर बोले ।
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रघु केवट के ज्ञानचक्षु खुल गए । वह समझ गया की उसके सामने कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं भगवान नारायण हैं । उसने उनके चरण कस कर पकड़ लिए ।
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हे नाथ ! मुझ शठ की ऐसी परीक्षा क्यों ले रहे हैं आप ? मैं कोई बड़ा विद्वान नहीं हूं । साधारण व्यक्ति हूं । क्या जीव-हत्या का मेरा अपराध इतना जघन्य है कि मुझे अपने दिव्य स्वरूप के दर्शन नहीं दे रहे ? कहते-कहते रघु केवट की आवाज रुंद गई
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भक्त की प्रार्थना और ऐसी दीन अवस्था: देख कर भक्तवत्सल भगवान ने अपने चतुर्भुज रूप में उसे दर्शन दिए ।
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भक्त ! मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूं । तू अपनी इच्छा प्रकट कर ।
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भगवन् ! आपके साक्षात दर्शन हो गये मुझे ओर कोई इच्छा नहीं है परंतु आपकी आज्ञा भी मैं नहीं टाल सकता ।
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प्रभु ! मैं जाती का मछेरा हूं । मेरे जीवन निर्वाह का यह साधन मुझे नहीं सुहाता ।
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आप यह कृपा करिए कि मैं इस स्वभाव से मुक्ति पा जाऊं और कभी अनजाने में भी यह अपराध मुझसे न हो । मेरी जिह्वा सदैव आपका ही नाम लेकर इस देह से छूटे ।
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तथास्तु ! प्रभु ने उसे स्पर्श करके कहा, उस स्नेहिल और विद्युतीय स्पर्श ने रधु केवट को अपने भ

 

ीतर किसी शक्ति का संचार प्रतीत हुआ।
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रघु ‘नारायण-नारायण’ भजता घर लौटा तो सबने उसे बुरा-भला कहा, परंतु उसने किसी की बात का बुरा नहीं माना, बस प्रभु का नाम लेता रहा। अब यही उसकी दिनचर्या हो गई। वह दिन-भर गांव में हरि-कीर्तन करता-फिरता।
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बहुत दिन व्यतीत हुए । गांव में वर्षा न होने से भीषण गर्मी पड़ रही थी ।
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ओ कामचोर भजनियां ! किसी ने कहा: यह बारिश कब होगी ?
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अभी होगी । इसी क्षण होगी। वह बोला। न कहीं बादल थे न कोई आसार, परंतु मेघ बरस उठे । तब से रघु केवट गांव-भर में सिद्ध पुरुष माना जाने लगा । वह जो भी कहता, वही सत्य हो जाता । लोग उसे आदर देने लगे ।
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अब लोग मनोकामना लेकर उसके पास आते । भीड़ होने लगी तो भजन में विघ्न होने लगा । उसने घर छोड़ दिया और वन में एक कुटिया बनाकर एकांत में भजन में रत हो गया ।
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एक दिन भोजन करने बैठा तो प्रतीत हुआ कि उसके नारायण उससे भोजन मांग रहे हैं । उसने भोजन भगवान को समर्पित कर दिया और भगवान् को भाव से बुलाने लगा ।
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भगवान् तो भाव के भूखे हैं । भावना तो उनके लिए पाश है । भक्तवत्सल श्री नारायण नीलांचल छोड्कर अपने भक्त की कुटिया में आ गए और भोजन करने लगे ।
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उधर उसी समय नीलांचल में श्री जगन्नाथ जी के भोग के लिए पुजारी ने अनेक सुगंधित भोग सजा लिए । श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान के भोग की अति उत्तम व्यवस्था है ।
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वहां भोग मंडप मंदिर से अलग स्थित है। वहा एक दर्पण इस तरह लगाया गया है कि मंदिर में विराजे श्री जगन्नाथ जी का प्रतिविम्ब भोग मंडप में दिखता है । उसी प्रतिबिम्ब को भोग लगाया जाता है ।
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पुजारी जी भोग सामग्री लेकर दर्पण के समक्ष पहुचे तो सकते में आ गए । दर्पण में जगन्नाथ जी का प्रतिबिम्ब नहीं था। पुजारी जी के तो हाथ-पैर फूल गए ।
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वह मंदिर में पहुंचे तो मूर्ति यथास्थान थी। वह पुन: भोगमंडप में आए तो प्रतिबिम्ब नहीं था।
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सर्वनाश ! अवश्य ही भोग में कोई दोष है, जो श्री जगन्नाथ जी ने भोग को अस्वीकार किया । महाराज को सूचना देता हूं । पुजारी जी दौड़े-दौड़े महाराज के पास पहुंचे ।
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महाराज ! अनर्थ हो गया । श्री जगन्नाथ क्या हममे रुष्ट हो गए । पुजारी ने आर्तनाद करते हुए कहा ।
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क्या कह रहे हो पुजारी जी ? राजा आश्चर्य से बोला ।
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पुजारी ने वृत्तांत कहा तो राजा नंगे पैरों मदिर का तरफ दौड़ा और पुजारी के कथन की सत्यता की जाँच की । उसे यह देखकर बड़ा दुख हुआ कि श्री जगन्नाथ जी ने उसका भोग अस्वीकार कर दिया था । वह विनय करने लगा
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हे नाथ ! क्या अपराध हो गया हे भवतारणहार यदि अनजाने में मुझसे कोई अपराध हुआ तो मैं दंड के लिए उपस्थित हूं ।
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इस प्रकार व्यथित हृदय से राजा वहीं मूर्ति के चरणों में लेट गया और निश्चय कर लिया कि जब तक भगवान उसका अपराध नहीं बताते वह वहा से नहीं हटेगा और न अन्न-जल ग्रहण करेगा ।
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इसी भाव से राजा वहीं सौ गया और उसे नींद आ गई । रात्रि में उसने स्वप्न देखा । स्वप्न में स्वय नीलांचल नाथ उससे कह रहे थे ।
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हे राजन् ! तुम्हारा कोई अपराध नहीं है । तुम्हें दुखी होने की आवश्यकता नहीं है । मेरा प्रतिबिम्ब इसलिए यहां नहीं था क्योंकि मैं स्वंय यहां नहीं था ।
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मैं तो इस समय पीपलीचटी ग्राम में अपने भक्त रघु केवट की कुटिया में उस के हाथ से भोजन कर रहा हूं । उसका भाव मुझे छोड़ता ही नहीं।
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यदि तुम मुझे यहा लाना चाहते हो तो स्वयँ आकर इसकी प्रार्थना करो। संभव हैं यह मान जाए । मैं तो इसके प्रेम के वश में हूँ । तुम इसे इसके परिवार सहित नीलांचल ले आओ अन्यथा मेरा लौटना संभव नहीं ।
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राजा की नींद टूटी तो वह हड़बड़ा कर उठा और उसी क्षण रघु केवट के यहाँ पीपलीचटी जाने की तैयारी कर ली ।
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ग्राम पहुंचकर रघु केवट का पता पूछा तो लोगों ने जगंल में स्थित उसकी झोपड़ी का पता बताया । राजा वहां पहुंचा ।
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कुटिया का द्वार खुला हुआ था । अन्दर रघु अन्न का ग्रास किसी के मुंह में रखता तो दिखाई देता था परंतु खाने वाला नजर न आता था । रघु तो भाव विभोर होकर प्रभु को भोजन करा रहा था ।
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सहसा प्रभु अंतर्धान हो गए । रघु जल बिन मछली की तरह तड़पने लगा। राजा ने उसे भाव विभोर होकर गोद में उठा लिया।
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रघु की चेतना लौटी तो उसने स्वय को राजा की गोद में देखा तो जल्दी से उठ कर राजा के चरण स्पर्श किए । राजा स्वयं उस भक्त के चरणों में नतमस्तक हो गया ।
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हे भक्तश्रेष्ठ ! इस दास की विनती स्वीकार करें । प्रभु ने स्वप्न में मुझे आदेश दिया है कि आप परिवार सहित मेरा आतिथ्य स्वीकार करें । पुरी नरेश ने हाथ जोड़कर विनती की ।
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महाराज ! प्रभु की आज्ञा मैं कैसे टाल सकता हूं ? तत्पश्चात राजा उसे परिवार सहित नीलांचल ले आया तब भोग मंडप के दर्पण में श्री जगन्नाथजी का प्रतिबिम्ब नजर आया ।
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राजा ने श्री जगन्नाथ जी के मंदिर के समीप दक्षिण में उसके रहने की व्यवस्था कर दी । रघु केवट अपनी माता और स्त्री के साथ भगवान का जाप करते हुए अंत समय परमध

 

ाम के भागी बनें ।