Article January 3, 2017

 

"Year after year is passing by. It’s high time we attach our obstinate mind on Hari."

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj

 

In this final lecture of the 'Conquest of the Mind' series, Swami Mukundananda continues to throw light on the various defects that are a part of our personality.  These defects are hampering our  progress on the spiritual path and as a consequence we are digressing from the goal of our life out of ignorance or laziness. 

 

If we have received an opportunity to become aware of our defects, we must  utilize this knowledge to the fullest. We must resolve firmly that God alone is the goal of our life

"Year after year is passing by. It’s high time we attach our obstinate mind on Hari."

- Jagadguru Shree Kripaluji Maharaj

 

In this final lecture of the 'Conquest of the Mind' series, Swami Mukundananda continues to throw light on the various defects that are a part of our personality.  These defects are hampering our  progress on the spiritual path and as a consequence we are digressing from the goal of our life out of ignorance or laziness. 

 

If we have received an opportunity to become aware of our defects, we must  utilize this knowledge to the fullest. We must resolve firmly that God alone is the goal of our life

"We are shaped by our thoughts, we become what we think.  When the mind is pure, joy follows like a shadow that never leaves."

                                                                                      - Buddha

 
Swami Mukundananda continues his lecture enlightening souls about the various obstacles that need to be overcome while practicing sadhana.

 
"Your living is determined not so much by what life brings to you as by the attitude you bring to life; not so much by what happens to you as by the way your mind looks at what happens."

- Khalil Gibran

 

We have heard innumerable times that in order to attain God we must surrender unto Him, yet we fail to do so. Have you ever wondered the reason why you have been unable to surrender so far?  
Swami Mukundananda tells us in this lecture that it is because of a number of obstacles that exist in our path of surrender to God.  Listen to this lecture and find out what those obstacles are.

तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥

भावार्थ : तत्‌ अर्थात्‌ 'तत्‌' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है- इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं ॥25॥

प्रभु के योग्य स्वयं बनें..
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एक राजा सायंकाल में महल की छत पर टहल रहा था. अचानक उसकी दृष्टि महल के नीचे बाजार में घूमते हुए एक सन्त पर पड़ी. संत तो संत होते हैं, चाहे हाट बाजार में हों या मंदिर में अपनी धुन में खोए चलते हैं.
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राजा ने महूसस किया वह संत बाजार में इस प्रकार आनंद में भरे चल रहे हैं जैसे वहां उनके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं. न किसी के प्रति कोई राग दिखता है न द्वेष.
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संत की यह मस्ती इतनी भा गई कि तत्काल उनसे मिलने को व्याकुल हो गए.
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उन्होंने सेवकों से कहा इन्हें तत्काल लेकर आओ.
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सेवकों को कुछ न सूझा तो उन्होंने महल के ऊपर ऊपर से ही रस्सा लटका दिया और उन सन्त को उस में फंसाकर ऊपर खींच लिया.
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चंद मिनटों में ही संत राजा के सामने थे. राजा ने सेवकों द्वारा इस प्रकार लाए जाने के लिए सन्त से क्षमा मांगी. संत ने सहज भाव से क्षमा कर दिया और पूछा ऐसी क्या शीघ्रता आ पड़ी महाराज जो रस्सी में ही खिंचवा लिया !
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राजा ने कहा- एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं अचानक ऐसा बेचैन हो गया कि आपको यह कष्ट हुआ.
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संत मुस्कुराए और बोले- ऐसी व्याकुलता थी अर्थात कोई गूढ़ प्रश्न है. बताइए क्या प्रश्न है.
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राजा ने कहा- प्रश्न यह है कि भगवान् शीघ्र कैसे मिलें, मुझे लगता है कि आप ही इसका उत्तर देकर मुझे संतुष्ट कर सकते हैं ? कृपया मार्ग दिखाएं.
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सन्त ने कहा‒‘राजन् ! इस प्रश्न का उत्तर तो तुम भली-भांति जानते ही हो, बस समझ नहीं पा रहे. दृष्टि बड़ी करके सोचो तुम्हें पलभर में उत्तर मिल जाएगा.
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राजा ने कहा‒ यदि मैं सचमुच इस प्रश्न का उत्तर जान रहा होता तो मैं इतना व्याकुल क्यों होता और आपको ऐसा कष्ट कैसे देता. मैं व्यग्र हूं. आप संत हैं. सबको उचित राह बताते हैं.
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राजा एक प्रकार से गिड़गिड़ा रहा था और संत चुपचाप सुन रहे थे जैसे उन्हें उस पर दया ही न आ रही हो. फिर बोल पड़े सुनो अपने उलझन का उत्तर.
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सन्त बोले- सुनो, यदि मेरे मन में तुमसे मिलने का विचार आता तो कई अड़चनें आतीं और बहुत देर भी लगती. मैं आता, तुम्हारे दरबारियों को सूचित करता. वे तुम तक संदेश लेकर जाते.
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तुम यदि फुर्सत में होते तो हम मिल पाते और कोई जरूरी नहीं था कि हमारा मिलना सम्भव भी होता या नहीं.
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परंतु जब तुम्हारे मन में मुझसे मिलने का विचार इतना प्रबल रूप से आया तो सोचो कितनी देर लगी मिलने में ?
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तुमने मुझे अपने सामने प्रस्तुत कर देने के पूरे प्रयास किए. इसका परिणाम यह रहा कि घड़ी भर से भी कम समय में तुमने मुझे प्राप्त कर लिया.
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हे राजन् ! इसी प्रकार यदि भगवान् को पाने की व्याकुलता हो तो भगवान् तत्काल तुम्हारे सामने आ जाएंगे
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राजा ने पूछा- परंतु भगवान् के मन में हमसे मिलने का विचार आए तो कैसे आए और क्यों आए ?
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सन्त बोले- तुम्हारे मन में मुझसे मिलने का विचार कैसे आया ?
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राजा ने कहा‒ जब मैंने देखा कि आप एक ही धुन में चले जा रहे हैं और सड़क, बाजार, दूकानें, मकान, मनुष्य आदि किसी की भी तरफ आपका ध्यान नहीं है, उसे देखकर मैं इतना प्रभावित हुआ कि मेरे मन में आपसे तत्काल मिलने का विचार आया.
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सन्त बोले- यही तो तरीका है भगवान को प्राप्त करने का. राजन् ! ऐसे ही तुम एक ही धुन में भगवान् की तरफ लग जाओ, अन्य किसी की भी तरफ मत देखो, उनके बिना रह न सको, तो भगवान् के मन में तुमसे मिलने का विचार आ जायगा और वे तुरन्त मिल भी जायेंगे.