Article November 14, 2016

Part 7 – Supreme Bliss in the path of Bhakti Yog

 

This article expounds the sweetness of Bhakti Yog in comparison to other paths of spirituality, particularly Gyan Yog.  Even the greatest gyani Shankracharya engaged in devotion to God because there is no other way to relish the bliss of Divine Love.

 

An incredible characteristic of God’s creation is the variety that exists in it, and to cater to varied interests of all people God has mercifully laid down different paths to reach Him.  There is the path of karm-kand where rituals prescribed in the Vedas take precedence in devotion, Gyan Yog where the principle is ‘soham’ or in other words the devotees declare their own selves to be God, and the path of Bhakti Yog in which devotees engage in loving devotion to God.  People are free to choose their spiritual paths as they like based on their inclinations and interests.  But for people who are engaged in Bhakti Yog and are experiencing the bliss of sweet association with the personal form of God, other paths seem absolutely insipid. So Shri Kripaluji Maharaj in His kirtan “jo piya ruchi mahaṁ ruchi rākhē” says

 

gyānahum nāhiṁ suhāve rē”.

 

भावार्थ : मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम 'सत्यभाषण' है), अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात्‌ चित्त की चञ्चलता का अभाव, किसी की भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव ॥2॥

 

 

भावार्थ : तेज (श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम 'तेज' है कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं), क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी देखनी चाहिए) एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं ॥3॥