Article September 15, 2016

जेहि खोजत योगीश मुिन

 

Great yogis desire Divine love intensely.  And the foremost of gyanis, like Janak, Sanak, and Shukdeo, came to Braj for the same nectar you have come here for.  They came in the form of trees, hoping to attain Divine love through the grace of the gopis.  I am speaking of liberated, completely pureparamhamsas, not just of those who dye their clothes saffron and go around posing as sanyasis.

 

 

श्रीभगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌ । 
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥

भावार्थ : श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं॥1॥

 

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌ ॥

भावार्थ : इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है) तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं॥34॥

आंसू तो कभी आँखो में ये भरने नही देता...
दर्द भी चेहरे पे उभरने नही देता...
इस तरहा रखता है मेरा मुरशद मुझ को समेट कर
की मै , टूट भी जाउ तो मुुझे ,
बीखरने नहीं देता..
Thank u so much Guruji 
 जय गुरू जी

There are three entities: the lover, the Beloved and love.  That which unites the lover and the Beloved, is called love.  In other words, love is the intimate union of the lover and the Beloved.  You know the meaning of the word ‘lover.’  And the ‘Beloved’ is he towards whom love is directed. 

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥

भावार्थ : हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है॥33॥