Article December 16, 2015

जो योगी मुझे तथा परमात्मा को अभिन्न जानते हुए परमात्मा की भक्तिपूर्वक सेवा करता है, वह हर प्रकार से मुझमें सदैव स्थित रहता है |
The yogī who knows that I and the Supersoul within all creatures are one worships Me and remains always in Me in all circumstances....

One who is protected by lord cannot be vanished by other beings or time while living or after life.

जो माँगे ठाकुर अपने ते, सोई सोई देवे
नानक दास मुख ते जो बोले, ईहा ऊन्हा सच होवे
जो माँगे ठाकुर अपने से ..........
चतुर दिसा कीनो बल अपना, सिर उपर कर तरिओ
किरपा कट्ताक्ष अवलोकन कीनो दास का दुख बिधार्‌यो...

गुरु मेरी पूजा गुरु गोविंद गुरु मेरा पारब्रह्म गुरु भगवंत.

In the seventh chapter of the Bhagavad Gita, Lord Krishna begins by saying, ‘Maiyy asakta-manah Partha yogam yunjan mad-ashrayah. Asamsayam samagram mam yatha jnasyasi tach-chrnu.’ (7.1)
He says, ‘By keeping all your affection on Me, and practicing the path of Yoga as described by Me, I shall now explain to you how you can know Me completely’.
Here, aasakti means affection, and ashraya means that which we depend on. There is affection (aasakti) ...

जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है उसके लिए न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है |
For one who sees Me everywhere and sees everything in Me, I am never lost, nor is he ever lost to Me....

वास्तविक योगी समस्त जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है | निस्सन्देह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्र्वर को सर्वत्र देखता है |
A true yogī observes Me in all beings, and also sees every being in Me. Indeed, the self-realized man sees Me everywhere....