Article September 28, 2015

Satsang is not mere company of the wise. A Mumukshu gains in spirituality every moment of his stay in his Guru's presence. How?.... He watches every action of his Guru, hears every word He utters, and comes to know every thought He thinks. In short, the development of the disciple depends upon his capacity to tune himself to his Guru. The tuning to the wise is Satsang....

जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास (उद्यम) इन्द्रियतृप्ति की कामना से रहित होता है, उसे पूर्णज्ञानी समझा जाता है | उसे ही साधु पुरुष ऐसा कर्ता कहते हैं, जिसने पूर्णज्ञान की अग्नि से कर्मफलों को भस्मसात् कर दिया है |
One is understood to be in full knowledge whose every act is devoid of desire for sense gratification. He is said by sages to be a worker whose fruitive action is burned up by the fire of perfect knowledge....

जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है॥ उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता॥ इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है॥
On...

Once there lived a poor brahmana in the city of Pratishthanapura in South India.
He was a very sincere devotee of the Lord Krishna and was satisfied with whatever the Lord had given Him. He used to hear the glories of the Lord from realized souls.
At one such meeting, while he was very faithfully hearing about Vaishnava activities, he was informed that these activities can be performed even by meditation.
So daily h...

To discriminate what is wrong and to be determined to do what is right is called determination. Fierce Determination and Gentle Humility are the ornaments which make one attractive in the eyes of the Lord.
Practical action is the best way to show our determination. So while chanting, we should show our determination to be attentive. This attracts Krishna's attention....

भगवान उद्धव से कहते हैं-- जो मनुष्य मेरी भक्ति से विहीन है ,उसकी चेतना को न सत्य तथा दया से युक्त धार्मिक कार्य, न ही कठिन तपस्या से प्राप्त किया गया ज्ञान पूर्णतया शुद्ध बना सकता है | [SB:11.14.22]

रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि जिसका हृदय जितना पापयुक्त होता है वो उतना ही संसारी विषयों की चर्चा करता है और विषयी जीवन का चिंतन करता है |
हमें अपने मन को साफ करने के लिए हरि गुरु का चिंतन करना चाहिए | हरि गुरु का चिंतन जितना होगा ये मन उतनी ही जल्दी शुद्ध होगा | जिस तरह गंदे कपड़े को साफ करने के लिए निर्मल पानी चाहिए उसी तरह गंदे मान को साफ करने के लिए हरिगुरु चिंतन चाहिए |
शुकराना गुरुजी हर उस पल का जो आपकी शरण में बिताया....
जय जय गुरुजी......

जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह सभी मनुष्यों में बुद्धिमान् है और सब प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त रहकर भी दिव्य स्थिति में रहता है |
One who sees inaction in action, and action in inaction, is intelligent among men, and he is in the tranecendental position, although engaged in all sorts of activities.
तात्पर्य
कृष्णभावनामृत में कार्य करने वाला व्यक्ति स्वभावतः कर्म-बन्धन से मुक्त होता है | उसके सारे कर्म कृष्ण के लिए....

In Dwarka, Krishna once manifest His jvara-lila. He was shivering with high fever. Narada Muni came and saw Krishna shivering:
“What happened?”
“High fever.”...