Article September 15, 2015

The glory of Puri Dham or the ancient Purusottama Kshetra is vividly described in the Utkal Khanda of Skanda Purana. The story of Rishi (Sage) Markandeya discovering this Kshetra at the time of Pralaya (Dissolution of the Universe) can be found there. The story goes like this-
Once at the time of Pralaya, when everything got submerged in the sea, Rishi Markandeya (who had been able to retain his physica....

हे भारतवंशी! जब भी और जहाँ भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब तब मैं अवतार लेता हूँ |
Whenever and wherever there is a decline in religious practice, O descendant of Bharata, and a predominant rise of irreligion-at that time I descend Myself....

When one day Krishna woke first from a rest in the forest with his cowherd friends, he decided to wake everyone and call the cows grazing at a distance by playing his flute. When Krishna blew the nectar of his lips into the flute, a melodious raga with a slow rhythm and a deep base emerged from its end. This wonderful vibration enchanted the peacocks in and around the Govardhan hills....

श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं॥
यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप -ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं....

Misconceptions Regarding Wealth & Happyness
There are many in this world, and specially in India, who think wealth & power can make a person happy. For them I say, I am comming right from that point, down the road, there is nothing!
Without the grace of the Lord, no one can become happy and prosperous....

भगवान ने कहा : भौतिक प्रकृति के तीन गुण, जिनके नाम सतो, रजो तथा तमोगुण हैं, भौतिक बुद्धि से संबद्ध होते हैं, आत्मा से नहीं | सतोगुण के विकास से मनुष्य रजोगुण तथा तमोगुण को जीत सकता है एवम दिव्य सत्व के अनुशीलन से, वह अपने को भौतिक सत्व से भी मुक्त कर सकता है | [SB: 11.13.1]
तात्पर्य
भौतिक जगत में सत्व कभी शुद्ध रूप में नहीं रहता, अतः यह सामान्य ज्ञान है कि भौतिक स्तर पर कोई भी निजी स्वार्थ के बिना कार्य नहीं कर सकता | ....

गुरुजी नहीं अब ज़ख़्म कोई गहरा चाहिये!
बस आपकी कृपाओं का पहरा चाहिए...!!
जय जय गुरुजी....