Article August 10, 2015

Narottama dāsa Ṭhākura says: “My real riches are Nityānanda Prabhu and the lotus feet of Śrī Rādhā and Kṛṣṇa.” He further prays, “O Lord, kindly give me this opulence. I do not want anything but Your lotus feet as my property.” (from purport Adi-lila 13.124)
Full text and purport...

जिन्होंने परम सत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, फिर भी,जो निपट अज्ञानता के अंधकार से परे हैं, वे सामान्यतया धर्म, अर्थ तथा काम इन तीन पवित्र कर्मकांडों का अनुसरण करते हैं | अन्य किसी उच्च उद्दैश्य के बारे में विचार करने के लिए समय न होने से वे अपनी ही आत्मा के आत्मघाती बन जाते हैं |
ऐसे आत्महंता यह मानते हैं कि मानवी बुद्धि अंततः भौतिक जीवन का विस्तार करने के लिए है | इस तरह अपने असली अद्धयात्मिक कर्तव्य की उपेक्षा करते हुए, वे सदैव कष्ट पाते हैं | वे उच्च आशाओं ऐवम स्वपनों से पूरित रहते हैं, किंतु दुर्भाग्यवश काल के अपेरिहार्य प्रवाह के कारण ये सब सदैव ध्वस्त हो जाते हैं |

हे प्रभु, आपके चरणकमल शरणागतों की संसार के समस्त कष्टों से उनकी रक्षा करते हैं | सारे मुनिगण उस आश्रय के अंतर्गत समस्त भौतिक कष्टों को निकाल फेंकते हैं | [SB: 3.5.39]
The demigods said: O Lord, Your lotus feet are like an umbrella for the surrendered souls, protecting them from all the miseries of material existence. All the sages under that shelter throw off all material miseries. We therefore offer our respectful obeisances unto Your lotus feet.

वेदों में नियमित कर्मों का विधान है और ये साक्षात् श्रीभगवान् (परब्रह्म) से प्रकट हुए हैं | फलतः सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञकर्मों में सदा स्थित रहता है |
Regulated activities are prescribed in the Vedas, and the Vedas are directly manifested from the Supreme Personality of Godhead. Consequently the all-pervading Transcendence is eternally situated in acts of sacrifice....

कैसे मान लूँ कि तू पल पल में शामिल नहीं....
कैसे मान लूँ कि तू हर चीज़ में हाज़िर नहीं...
कैसे मान लूँ कि तुझे मेरी परवाह नहीं...
कैसे मान लूँ कि तू दूर है पास नहीं....
देर मैंने ही लगाई पहचानने में मेरे ईश्वर..

आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं॥
You are the original Personality, the Godhead. You are the only sanctuary of this manifested cosmic world. You know everything, and You are all that is knowable. You are above the material modes. O limitless form! This whole cosmic manifestation is pervaded by You!

The saintly king Yudhisthira maharaj said, "Oh Supreme Lord, I have heard from You the glories of fasting on Deva-sayani Ekadasi, which occurs during the light fortnight of the month of Ashadha.
Now I would like to hear from You the glories of the Ekadasi that occurs during the dark fortnight (krishna paksha) of the month of Shravana (July -August).
Oh Govindadeva, please be merciful to me and explain its glories.
Oh Supreme Vasudeva, I offer my most humble obe...

सारे प्राणी अन्न पर आश्रित हैं, जो वर्षा से उत्पन्न होता है | वर्षा यज्ञ सम्पन्न करने से होती है और यज्ञ नियत कर्मों से उत्पन्न होता है |
All living bodies subsist on food grains, which are produced from rain. Rains are produced by performance of yajña [sacrifice], and yajña is born of prescribed duties....

हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं॥
O great one, who stands above even Brahmā, You are the original master. Why should they not offer their homage up to You, O limitless one? O refuge of the universe, You are the invincible source, the cause of all causes, transcendental to this material manifestation.