Article August 8, 2015

“Without Guru We Are Simply a Street Dog” His Grace Sankarshan Das Adhikari : Lecture on Srimad Bhagavatam 4.29.71
supti-mūrcchopatāpesu
prāṇāyana-vighātataḥ
nehate 'ham iti jñānaḿ
mṛtyu-prajvārayor api...

समस्त जीवों के स्वामी, भगवान सृष्टि के पूर्व अद्वय रूप में विद्यमान थे | केवल उनकी इच्छा से ही यह सृष्टि संभव है और सारी वस्तुएँ पुनः उनमें लीन हो जाती हैं | इन परम पुरुष को विविध नामों से उपलक्छित किया जाता है |
[SB: 3.5.23]
The Personality of Godhead, the master of all living entities, existed prior to the creation as one without a second. It is by His will only that creation is made possible and again everything merges in Him. This Supreme Self is symptomized by differe...

भगवान् के भक्त सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि वे यज्ञ में अर्पित किये भोजन (प्रसाद) को ही खाते हैं | अन्य लोग, जो अपनी इन्द्रियसुख के लिए भोजन बनाते हैं, वे निश्चित रूप से पाप खाते हैं |
The devotees of the Lord are released from all kinds of sins because they eat food which is offered first for sacrifice. Others, who prepare food for personal sense enjoyment, verily eat only sin....

कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ॥मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ॥....

बद्ध जीव अपने शवतुल्य भौतिक शरीरों तथा अपने संबंधियों ऐवम साज-सामान के प्रति स्नेह से पूरी तरह बँध जाते हैं |ऐसी गर्वित ऐवम मूर्खतापूर्ण स्थिति में बद्धजीव अन्य जीवों के साथ-साथ समस्त जीवों के हृदय में वास करने वाले
भगवान हरि से भी द्वेष करने लगते हैं |इस प्रकार अन्यों का अपमान करने से बद्धजीव क्रमशः नरक में जा गिरते हैं| [SB: 11.5.15]