Article August 7, 2015

“Of all yogis, he who abides in Me with great faith is the highest of all.”
It is by great fortune that one comes to Kṛṣṇa consciousness on the path of bhakti-yoga to become well situated according to the Vedic direction. The ideal yogī concentrates his attention on Kṛṣṇa, who is called Śyāmasundara, who is as beautifully colored as a cloud, whose lotus-like face is as effulgent as the sun, whose dress is brilliant with jewels and whose body ...

So I may inform you little about this movement, Krsna consciousness. Krsna, this word, means all-attractive. Krsna is attractive to every living entities, not only human being, even the animals, birds, bees, trees, flowers, fruits, water. That is the picture of Vrndavana. This is material world. We have no experience of the spiritual world. But we can get an glimpse idea, wh...

जो व्यक्ति कृष्ण कथाओं का निरंतर श्रवण करते रहने के लिए आतुर रहता है, उसके लिए कृष्णकथा क्रमशः अन्य सभी बातों के प्रति उसकी उदासीनता को बढ़ा देती है | वह भक्त जिसने दिव्य आनंद प्राप्त कर लिया हो उसके द्वारा भगवान के चरणकमलों का ऐसा निरंतर स्मरण तुरंत ही उसके सारे कष्टों को दूर कर देता है | [SB: 3.5.13]
For one who is anxious to engage constantly in hearing such topics, kṛṣṇa-kathā gradually increases his indifference towards all other things. Such constant remembrance of the ...

जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले विभिन्न देवता यज्ञ सम्पन्न होने पर प्रसन्न होकर तुम्हारी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करेंगे | किन्तु जो इन उपहारों को देवताओं को अर्पित किये बिना भोगता है, वह निश्चित रूप से चोर है |
In charge of the various necessities of life, the demigods, being satisfied by the performance of yajña [sacrifice], supply all necessities to man. But he who enjoys these gifts, without offering them to the demigods ...

आया था किस काम को किया कौन सा काम,
भूल गये भगवान को कमा रहे धनधाम,
कमा रहे धनधाम रोज उठ कर लबारी,
झूट कपट का जोड़ बने तुम माया धारी,
कहते दस कबीर साहेब की सूरत बिसारी,...

निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह
तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥
हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ॥....

संचित धन का एकमात्र उचित फल धार्मिकता है, जिसके आधार पर मनुष्य जीवन की दार्शनिक जानकारी प्राप्त कर सकता है, जो अंततः परब्रह्म की प्रत्यक्ष अनुभूति में और इस तरह समस्त कष्ट से मोक्ष में परिणत हो जाता है |....