Article July 31, 2015

8 Sept 73 , Stokholm,Srila A. C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
Prabhupada:
...yogam yunjan mad-asrayah
asamsayam samagram mam...

In picture; At the top Krishna is dancing with His purest devotees as a lover. On the lotus petals the Lord is reciprocating with His devotees as a son, as a friend and as a master. Below left, a devotee in the material world is associating with Krishna personally by painting His transcendental form. Next, an impersonalist, by his meditation, is merging with the brahmajyoti, the spiritual effulgence emanating from the Lord’s body. On t...

प्रकृति के विभिन्न गुण -- सातो गुण, रजो गुण तथा तमो गुणों-- के अनुसार विभिन्न प्रकार के प्राणी होते हैं, जो देवता , मनुष्य तथा नारकीय जीव कहलाते हैं| हे राजन, यही नहीं, जब कोई एक गुण अन्य दो गुणों से मिलता है, तो वह तीन में विभक्त होता है और इस प्रकार प्रत्येक प्राणी अन्य गुणों से प्रभावित होता है और उसकी आदतों को अर्जित करता है |....

गुरु जी के चरणों में नमन

सतगुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावणहार॥

 

प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है, अतः कोई भी क्षणभर के लिए भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता |
All men are forced to act helplessly according to the impulses born of the modes of material nature; therefore no one can refrain from doing something, not even for a moment....

हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर॥ इस प्रकार, जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान के अर्पण होते हैं- ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा।
O son of Kunti, all that you do, all that you eat, all that you offer and give away, as well as all austerities that you may perform, should be done as an offering unto Me.In this way you will be freed from all reactions to good and evil deeds, and by this principle of renunciation you will be liberated and come to Me.

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान ही इस ब्रह्माण्ड के सृजन, पालन तथा संहार के कारण हैं, फिर भी उनका कोई पूर्व कारण नहीं है | वे हर जीव के शरीर में परमात्मा रूप में प्रवेश करके शरीर, प्राण-वायु तथा मानसिक क्रियाओं को जागृत करते हैं, जिससे शरीर के सभी सूक्ष्म तथा स्थूल अंग अपने अपने कार्य शुरू कर देते हैं | अतः भगवान सर्वोपरि हैं |
[SB: 11,3,35]