भगवान पुनः कहते हैं--

 

जिस व्यक्ति ने यह जान कर कि वह मुझसे भिन्न नहीं है,मुझे प्राप्त कर लिया है, वह अनुभव करता है कि मान निरंतर इंद्रियतृप्ति के कारण इंद्रिय-विषयों में रमा रहता है और भौतिक वस्तुएँ मान के भीतर स्पष्टत्या स्थित रहती हैं | मेरे दिव्य स्वभाव को समझ लेने के बाद, वह मन तथा इसके विषयों को त्याग देता है | [SB: 11.13.26]

 

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