Krishna

 

जब मनुष्य अपने हृदय में भगवान के चरणकमलों को जीवन के एकमात्र लक्ष्य
के रूप में स्थिर करके भगवान की भक्ति में गंभीरता पूर्वक संलग्न होता है, तो वह अपने हृदय के भीतर स्थित उन असंख्य अशुद्ध इच्छाओं को विनष्ट कर सकता है, जो प्रकृति के तीन गुणों के अंतर्गत उसके पूर्वकर्मों के फल के कारण संचित होती हैं | जब इस तरहा हृदय शुद्ध हो जाता है, तो वह भगवान को तथा अपने को दिव्य जीवों के रूप में प्रत्यक्षतः अनुभव कर सकता है | इस तरहा वह प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा अद्धयात्मिक ज्ञान में निष्णात हो जाता है, जिस तरहा कि सामान्य स्वस्थ दृष्टि द्वारा सूर्य-प्रकाश का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है |
[SB: 11,3,40]

 

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