Shrimad Bhagwat Gita: Chapter 2 Shloka 16

 

तत्त्वदर्शियों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि असत् (भौतिक शरीर) का तो कोई चिरस्थायित्व नहीं है, किन्तु सत् (आत्मा) अपरिवर्तित रहता है | उन्होंने इन दोनों की प्रकृति के अध्ययन द्वारा यह निष्कर्ष निकाला है |

Those who are seers of the truth have concluded that of the nonexistent there is no endurance, and of the existent there is no cessation. This seers have concluded by studying the nature of both.

PURPORT

There is no endurance of the changing body. That the body is changing every moment by the actions and reactions of the different cells is admitted by modern medical science; and thus growth and old age are taking place in the body. But the spirit soul exists permanently, remaining the same despite all changes of the body and the mind. That is the difference between matter and spirit. By nature, the body is ever changing, and the soul is eternal. This conclusion is established by all classes of seers of the truth, both impersonalist and personalist. In the Visnu Purana it is stated that Visnu and His abodes all have self-illuminated spiritual existence. "Jyotimsi visnur bhuvanani visnuh". The words existent and nonexistent refer only to spirit and matter. That is the version of all seers of truth. 
This is the beginning of the instruction by the Lord to the living entities who are bewildered by the influence of ignorance. Removal of ignorance involves the reestablishment of the eternal relationship between the worshiper and the worshipable and the consequent understanding of the difference between the part and parcel living entities and the Supreme Personality of Godhead. One can understand the nature of the Supreme by thorough study of oneself, the difference between oneself and the Supreme being understood as the relationship between the part and the whole. In the Vedanta-sutras, as well as in the Srimad-Bhagavatam, the Supreme has been accepted as the origin of all emanations. Such emanations are experienced by superior and inferior natural sequences. The living entities belong to the superior nature, as it will be revealed in the Seventh Chapter. Although there is no difference between the energy and the energetic, the energetic is accepted as the Supreme, and energy or nature is accepted as the subordinate. The living entities, therefore, are always subordinate to the Supreme Lord, as in the case of the master and the servant, or the teacher and the taught. Such clear knowledge is impossible to understand under the spell of ignorance, and to drive away such ignorance the Lord teaches the Bhagavad-gita for the enlightenment of all living entities for all time.

तात्पर्य

परिवर्तनशील शरीर का कोई स्थायित्व नहीं है | आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की ने भी यह स्वीकार किया है कि विभिन्न कोशिकाओं की क्रिया-प्रतिक्रिया द्वारा शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है | इस तरह शरीर में वृद्धि तथा वृद्धावस्था आती रहती है | किन्तु शरीर तथा मन में निरन्तर परिवर्तन होने पर भी आत्मा स्थायी रहता है | यही पदार्थ तथा आत्मा का अन्तर है | स्वभावतः शरीर नित्य परिवर्तनशील है और आत्मा शाश्र्वत है | तत्त्वदर्शियों ने, चाहे निर्विशेषवादी हों या सगुणवादी, इस निष्कर्ष की स्थापना की है | विष्णु-पुराण में (२.१२.३८) कहा गया है कि विष्णु तथा उनके धाम स्वयंप्रकाश से प्रकाशित हैं – (ज्योतींषि विष्णुर्भुवनानि विष्णुः) | सत् तथा असत् शब्द आत्मा तथा भौतिक पदार्थ के ही द्योतक हैं | सभी तत्त्वदर्शियों की यह स्थापना है |

यहीं से भगवान् द्वारा अज्ञान से मोहग्रस्त जीवों को उपदेश देने का शुभारम्भ होती है | अज्ञान को हटाने के लिए अराधक और आराध्य के बीच पुनः शाश्र्वत सम्बन्ध स्थापित करना होता है और फिर अंश-रूप जीवों तथा श्रीभगवान् के अन्तर को समझना होता है | कोई भी व्यक्ति आत्मा के अध्ययन द्वारा परमेश्र्वर के स्वभाव को समझ सकता है – आत्मा तथा परमात्मा का अन्तर अंश तथा पूर्ण के अन्तर के रूप में है | वेदान्त-सूत्र तथा श्रीमद्भागवत में परमेश्र्वर को समस्त उद्भवों (प्रकाश) का मूल माना गया है | ऐसे अद्भओं का अनुभव परा तथा अपरा प्राकृतिक-क्रमों द्वारा किया जाता है | जीव का सम्बन्ध परा प्रकृति से है, जैसा कि सातवें अध्याय से स्पष्ट होगा | यद्यपि शक्ति तथा शक्तिमान में कोई अन्तर नहीं है, किन्तु शक्तिमान को परम माना जाता है और शक्ति या प्रकृति को गौण | अतः सारे जीव उसी तरह परमेश्र्वर के सदैव अधीन रहते हैं जिस तरह सेवक स्वामी के या शिष्य गुरु के अधीन रहता है | अज्ञानावस्था में ऐसे स्पष्ट ज्ञान को समझ पाना असम्भव है | अतः ऐसे अज्ञान को दूर करने के लिए सदा सर्वदा के लिए जीवों को प्रवृद्ध करने हेतु भगवान् भगवद्गीता का उपदेश देते हैं |

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः |
उभयोरपि दृष्टोSन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः || १६ ||

न – नहीं; असतः – असत् का; विद्यते – है; भावः – चिरस्थायित्व; न – कभी नहीं; अभावः – परिवर्तनशील गुण; विद्यते – है; सतः – शाश्र्वत का; उभयोः – दोनो का; अपि – ही; दृष्टः – देखा गया; अन्तः – निष्कर्ष; तु – निस्सन्देह; अनयोः – इनक; तत्त्व – सत्य के; दर्शिभिः – भविष्यद्रष्टा द्वारा |

nasato vidyate bhavo 
nabhavo vidyate satah 
ubhayor api drsto 'ntas 
tv anayos tattva-darsibhih

SYNONYMS

na--never; asatah--of the nonexistent; vidyate--there is; bhavah--endurance; na--never; abhavah--changing quality; vidyate--there is; satah--of the eternal; ubhayoh--of the two; api--verily; drstah--observed; antah--conclusion; tu--but; anayoh--of them; tattva--truth; darsibhih--by the seers

 

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